आयनें

Victoria Park में साथ चलते चलते एक दूसरे का हाथ अचानक छुट गया । नाराज़ होकर बोलीं तुम मेरा होना भी चाहते हो और होने से भी डरते हो । चलो मैं तुम्हें अपना बनाकर दुनिया को बतला देतीं हूँ। ।

उसको आँखों में छुपा लेना चाहता था रोहीत । 

अचानक बोल पड़ी – रोहीत मैं डर रही हूँ।

क्यूँ रितु क्या हुआँ ?

रोहीत कही कोई तुम्हे मुझसे छीन ना ले ।

तुम छिनने दोगी?

नहीँ ! रोहीत कभी नहीं ।

फिर डर कैसा रितु ?

कहीं तुम किसी के पास ना चले जाओ ?

नहीं रितु मैं ऐसा नही कर सकता ।

क्यों रोहीत क्यों नही कर सकते?

रितु ! क्योंकि मेरे घर में आयना हैं और रोज मैं उसमें अपना चेहरा में तुम्हें देखता हूँ ।

   –  राजीव रोशन 

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सपनें

गंगा से आती हवाएं उसकी नारंगी साड़ी उड़ाने लगी । एक हाथ रेलींग पर और एक उसके हाथ में । दोनों की पीठ हावड़ा ब्रीज़ की तरफ़ । पास से गुजरते हज़ारो  लोग । सामने गंगा की शांत धारा । लोग और गंगा के बीच एक ही दिवार थीं । दोनों की पीठ । 

ये गंगा अपने सागर से मिलने के लिए कितनी बेकल है ना । रोहीत मैं तुमसे मिलने के लिए गंगा सी हो जाऊ ?

रितु तुम भी ना…. गंगा अपने सागर से मिलके कही खो जाती है । मैं तुम्हे स्वतंत्र देखना चाहता हूँ , इस धारा सी।

तुम मुझे पाना चाहते हो या बहाना चाहते हो ।

मैं बहना चाहता हूँ । बस तुम्हारे साथ । सपनो के पैर भी तो नहीं होते ना जो आसानी से चल सकें ।

रोहीत के कंधे पे सर रख के रितु डूबते सूरज को देखने लगी।

        – राजीव रोशन

प्रेम

प्रिये,

तुम्हारे नाम के साथ कुछ जोड़ने की हिम्मत नहीं है मेरी, न ही कुछ और जोड़ना मैं जरुरी समझता हूँ।

तुम्हारा नाम लेने के साथ जो चेहरा उभरता है, उससे तो सहज प्यार हो जाये। फिर तुम्हे किसी और विशेषण की क्या जरुरत। तुम तक यह बात लिखकर पंहुचा रहा हूँ, क्योंकि तुम्हारे सामने होने पर मैं कुछ बोल नही पाता । सोचता बहुत हूँ, की इस बार मिला तो ये कह दूंगा या वो कह दूंगा। लेकिन कभी कह नही पाता । तुम्हारी मासूम सी आँखों से जब तुम मुझे देखकर निश्छल बच्चों सी हँस देती हो, मैं सब कुछ वही भूल जाता हूँ। और उसके बाद जब तुम बोलना शुरू करती हो, तो रूकती कहाँ हो, मैं तो असहाय सा फिर तुम्हारी कहानियों में तुम्हारे पीछे-पीछे चलता रहता हूँ।

इतनी बातें करनी होती है तुम्हे क़ि मुझे आश्चर्य होता है कि तुम्हारी बातें इतनी हि शब्दों में पूरी कैसे हो जाती हैं। और वो जो तुम अपने चेहरे पर आने वाले बालों को सिर्फ एक ऊँगली से कानों के पीछे टिका देती हो, तो मेरा दिल भी मानो उसी में कही उलझ जाता हैं। और चाय के कप को दोनों हाँथो से पकड़कर जब तुम चाय को फूंकती हो, उस हवा में मेरे सारे ख्याल झट से उर जातें हैं और सिर्फ तुम्हारा चेहरा दिमाग में बस जाता हैं। जाने क्या है तुम्हारे अंदर की जो इंसान तुम्हे एक बार जान ले वो तुम्हे लेकर इतना प्रोटेक्टिव हो जाता है कि दुनिया भर से तुम्हारी मासूमियत को बचा लेना चाहता है।

तुम्हारे ख्याल के अंदर जाने का तो रास्ता है लेकिन बाहर आने का नहीं। कहना बस इतना है कि मैं चाहता हूँ की तुम्हारी हर हँसी के साथ हँसने के लिए और तुम्हारे हर आँसू को समेटने के लिए मैं तुम्हारे पास रहूं। मैं तुम्हारी कहानियो में घूमना चाहता हूँ, तुम्हारी बकबक सुनना चाहता हूँ। तुम्हारे साथ लड़ना और तुम्हे मनाना चाहता हूँ। ज़िन्दगी की भागदौड़ के बीच से ये छोटी छोटी खुशियां चुराना सीखना चाहता हूँ। तुम्हारी हँसी की वजह होना चाहता हूँ। तुमसे जीना सीखना चाहता हूँ, और ह अब मै तुमसे कह सकता हूँ की मैं तुमसे कितना प्यार करता हूँ, और शायद इससे भी ज्यादा प्यार करना चाहता हूँ।

          –  राजीव

आज

साहित्य जो आज के समय में ज़िंदगी में कोई अहमियत नही रखता , उसके लरखराते कदमो को सहारा देना बहुत जरुरी हैं।

ये समय साहित्य की चर्चा या आलोचना का नहीं हैं, मैं आपसे सिर्फ इतना ही कह सकता हूँ की सारी दुनिया इस वक़्त एक बदहवासी की दौर से गुजर रहा है । और कहते हुए ख़ुशी है कि इसके ज़िमेदार हम ही हैं। 

दौलत की भूखी इस दुनिया में हर किसी की रूह प्याशी हैं । कितना अच्छा लगता है जब हम देखते है कि हम सभी बाज़ार के कब्जे में आ चुके हैं। ऐसा बाज़ार जिसमे प्यार को व्यपार में बदल दिया हैं। 

यहाँ आदमी कुछ नहीं , वफ़ा कुछ नहीं , दोस्ती कुछ नहीं। और मुझे ये कहते हुए बिलकुल भी शर्म महसुस नहीं हो रही क्योंकि इसके ज़िमेदार भी हम ही हैं। 

एक अज़ीब से सपने में खोए हुए है हम , एक नयी शताब्दी की उम्मीद में जहाँ ज़िन्दगी से मौत सस्ती हैं। 

कितना अच्छा लगता है, की हमारी पुरानी ताखियानुषी संस्कृती, संस्कार , परंपरा, भावनाओं की कीमत कुछ नहीं है। हम इंसान कितने महान हैं, जिन्होंने अपने ही हाँथो अपने बर्बादी का सामान बनाया है, और उसी तबाही का नजारा हम मज़े ले ले कर देख रहे हैं। 

हमे कहते हुए गर्व होता है कि आने वाली पीढ़ी को हम विरासत में एक खोखला समाज दे रहे हैं। जहाँ आदर्श नहीं, प्रेम नहीं, एक दूसरे के लिए सम्मान नहीं। जहाँ हथियारों को फूलों की मालाएं पहनाई जाती हों, विडियो गेम से बच्चो को सिर्फ जंग और खून के नज़ारे दिखाये जाते हो, कितना अच्छा असर परता होगा उनके नन्हे और मासूम जेहनो पर। 

ऐसे आने वाले पीढ़ियों को शुभकामना ……..

       सौजन्य – गौतम घोष 

प्रेम

प्रेम इस पृथ्वी की अमरभावना हैं । प्रेम जीवन देता है और जीवन इसी प्रेम की अग्नी में जल कर भस्म हो जाता हैं। 

इस प्रेम का अंत बहुत दुःखदायी है, जल कर ख़ाक होने के बाद भी इस मुहब्बत की परवाज़ बहुत ऊँची होती हैं, लेकिन इस मुहब्बत के परिंदे का पर काट दिया जाए तो वो फिर किसी साख़ पर रुक जाएगा और अगर साख़ को ही काट दिया जाए तो……………..

अहसास

सुनो…

क्या कभी तुम्हे भी हुआ है

प्रेम का अहसास….

कभी लगा है

उड़ रहे हो आसमा में

ऐसा जंहा में

बस प्रेम ही प्रेम समाया है….

कभी लगा है

सब बन्धन छोड़ कर

पूनम के चंदा के साथ

बैठ कर प्रेम की पींगे भरी है…..

कभी लगा है

मोती जैसा धवल

प्रेम सागर से ही निकल कर

मेरी अंजुरी में समा गया है….

कभी लगा है
तिमिर में रोशनी देते जुगनू

जैसे प्रेम ने 

हमारी ज़िन्दगी रोशन की है….

कभी लगा है
प्रेम पास हर पल

चातक की प्यास जैसे

बारिश की बूंदों जैसे

जीवन के हर पड़ाव में

साथ तुम्हारे…..

कभी लगा है…………!!!!!!!!!!!!

यात्रा

सियालदाह जंक्शन

प्लेटफॉर्म नं 9C

सियालदाह से जयनगर जाने वाली गंगासागर एक्सप्रेस , अपने नियत समय 5:45PM में खुल गयी। मैं अपने ममेरे भाई को छोड़ने गया था । स्टेशन पे उस  वक़्त अनेक ख्याल मन में आने लगे। वो सारी बातें जो हम तीनों यहाँ कलकता के घर में किया करते थे। अनेक बातें एक साथ मेरे जेहन में आ उतरीं। बस हर पल यही लग रहा था कि अब घर कैसा लग रहा होगा, एकदम सुना सुना । दिल कर रहा था कि रोक लू उसे और बोल दू की अभी मत जा, हमलोग साथ ही चलेंगे दिसम्बर में। लेकिन मैं उसे नही रोक पाया। “दसवीं की परीक्षा फॉर्म भी कितनी जल्दी निकल गईं” बस यही सोच रहा था कि सामने के कॉफ़ी स्टॉल पे जाने से खुद को नही रोक पाया । 

बहुत मुश्क़िल होता है ना किसी को स्टेशन छोर के वापस अकेले आना। पुरे रास्ते जेहन में वही पुरानी झिलमिल करती यादें समायी रहती हैं।

“सर ठाकुरपुकुर बाजार आ गया अब किधर जाना है” टैक्सी वाले के इस वाक्य से चेतना लौटी । लगा की किसी ने उत्सव के माहौल से खींच लाया हो और किसी सुनसान घर में बंद कर दिया हो।

 “बस भैया आगे से बायां ले लो” और फिर मैं लौट आया उसी सुने से घर में। 

      Rajiv Roshan